PAC ने 38 मुसलमानों को गोली मारकर नदी में फेंक दिया था , इस नरसंहार के 8 दोषियों को कोर्ट ने दिया जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने 1987 में ‘पीएसी’ (PAC) की एक कंपनी द्वारा 38 लोगों की कथित हत्या से जुड़े हाशिमपुरा नरसंहार (Hashimpura Massacre) केस के आठ दोषियों को जमानत दे दिया है ये मामला 1987 का है, जब उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा में नरसंहार हुआ था। 22 मई 1987 का वह दिन जब मेरठ के हाशिमपुरा इलाके में एक समुदाय के ही 50 पुरुषों को इकट्ठा किया गया और फिर उन्हें वाहन में लादकर शहर के बाहर ले जाया गया। इसके बाद उन्हें गोली मार दी गई

 

हाशिमपुरा जो मेरठ जनपद में है। इसे 1933 में मुफ्ती हाशमी ने बसाया था। यहां लगभग 600 घर हैं। 3 हजार से अधिक लोग रहते हैं। यह मोहल्ला तीन तरफ से हिंदू आबादी से घिरा है। यहां लगभग 80 फीसदी से अधिक बुनकर हैं। जिस दिन यह घटना हुआ वो रमजान महीने का आखिरी जुमा था

क्या हुआ था 1987 के 22 मई को

पीएसी की 41वीं बटालियन की ‘सी कंपनी’ के जवानों ने सांप्रदायिक तनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में मेरठ के हाशिमपुरा इलाके से लगभग 50 मुस्लिम पुरुषों को कथित तौर पर घेर लिया था ।

सांप्रदायिक दंगों के कारण पीड़ितों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के बहाने शहर के बाहरी इलाके में ले जाया गया था जहां सभी को गोली मारकर कुछ लोगों के शवों को गंग नहर में और बाकी शवों को हिंडन नदी में फेंक दिया। इस घटना में 38 लोगों की मौत हो गई थी तथा केवल पांच लोग ही इस भयावह घटना को बयां करने के लिए बचे ।

 

2015 में सभी आरोपियों को सबुत में कमी के आधार पर बरी कर दिया था लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2018 में अधीनस्थ अदालत के फैसले को पलट दिया और 16 आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 364 (हत्या के लिए अपहरण) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के साथ धारा 120 बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई

 

समी उल्लाह, निरंजन लाल, महेश प्रसाद और जयपाल सिंह – का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तिवारी ने शुक्रवार को तर्क दिया कि अपीलकर्ता उच्च न्यायालय के फैसले के बाद से छह साल से अधिक समय से जेल में हैं। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ताओं को पहले अधीनस्थ अदालत द्वारा बरी किया जा चुका है तथा अधीनस्थ अदालत में सुनवाई और अपील प्रक्रिया के दौरान उनका आचरण अच्छा रहा है।

 

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत द्वारा सोच-विचारकर सुनाए गए बरी करने के फैसले को पलटने का गलत आधार पर निर्णय लिया। अदालत ने दलीलों पर गौर किया और आठ दोषियों की आठ लंबित जमानत याचिकाओं को स्वीकार कर लिया

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